Thursday, 21st September 2017

नोटबंदी का साइड इफैक्ट : शहडोल में भाजपा मुश्किल में

Sat, Nov 12, 2016 5:13 PM

Mahendra Narayan Singh Yadav -

नोटबंदी के ऐलान के बाद से देश भर में फैली अराजकता की स्थिति का सबसे बुरा असर मध्य प्रदेश के शहडोल लोकसभा उपचुनाव पर पड़ रहा है। नोट बदलने के लिए परेशान जनता के बीच वोट माँगने के लिए भाजपा के कार्यकर्ता हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। दलपत सिंह परस्ते के निधन के बाद खाली हुई शहडोल सीट पर उपचुनाव के लिए 19 नवंबर को वोटिंग होनी है। बुरहानपुर जिले की नेपानगर विधानसभा सीट पर भी इसी तारीख को उपचुनाव होना है और वहाँ भी भारतीय जनता पार्टी प्रचार के लिए कार्यकर्ताओं की कमी से जूझ रही है।

शहडोल में भाजपा ने जीत पक्की करने के लिए कैबिनेट मंत्री ज्ञान सिंह को उतारा है, और उनके सामने कांग्रेस ने पूर्व सांसद राजेश नंदिनी सिंह की बेटी हिमाद्री सिंह को उतारा है। कांग्रेस की भी हालत पस्त है, क्योंकि आदिवासी बहुल सीट पर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने अपने सबसे बड़े नेता हीरासिंह मरकाम को उतारकर मामला त्रिकोणीय बना दिया है। 

शहडोल से ही लगा इलाका छत्तीसगढ़ का मरवाही है जो कि कांग्रेस से निकाले गए अजीत जोगी का प्रभाव क्षेत्र है। कांग्रेस और भाजपा की मुश्किलें बढ़ाने के लिए अजीत जोगी ने शहडोल में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का समर्थन करने का नहीं, बल्कि सक्रिय प्रचार करने का भी ऐलान किया है। राजनीति में आने से पहले अजीत जोगी शहडोल में जिला कलेक्टर भी रहे हैं, और उस कार्यकाल में उन्होंने इलाके में अच्छी लोकप्रियता हासिल की थी।

शहडोल  सीट पर थोड़ा-बहुत असर रखने वाले जनता दल यूनाइटेड के नेता शरद यादव का भी हीरासिंह मरकाम से अच्छा संबंध है, और माना जा रहा है कि स्टार प्रचारक अजीत जोगी के साथ-साथ शरद यादव भी होंगे। इसके अलावा, समाजवादी पार्टी भी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को समर्थन देकर भाजपा की हार सुनिश्चित करने में लगी है।

नोटबंदी से भाजपा के खिलाफ माहौल बहुत तेज हो गया है। हालात ये हो गए हैं कि छुटभैये कार्यकर्ता जैसे-तैसे हिम्मत जुटाकर प्रत्याशी के पक्ष में वोट देने की अपील तो कर लेते हैं, लेकिन भाजपा और मोदी के पक्ष में कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। कुछेक जगह मोदी के नारे लगाने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ नाराज मतदाताओं ने बदसलूकी भी की है और थोड़ी-बहुत मारपीट भी की है।

आर्थिक संकट से जूझ रहे शहडोलवासी इस समय बैंकों के सामने लंबी-लंबी लाइनें लगाकर परेशान हैं, और ऐसे में जब कोई उनके सामने भाजपा और मोदी की तारीफ करता है, तो उनका गुस्सा फट पड़ता है। भाजपा का चुनाव संभाल रहे रणनीतिकारों ने कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करके इस समस्या का समाधान निकालने की भी कोशिश की है, लेकिन कोई कारगर समाधान नहीं निकल पाया है।

भाजपा कार्यकर्ताओं ने तो प्रचार पर निकलने के लिए सुरक्षा की माँग भी कर दी है, लेकिन समस्या ये है कि कुछ बड़े नेताओं के अलावा, बाकी किसी को इस तरह की सुरक्षा मुहैया कराने में प्रशासन भी नाकाम है। बैंकों और एटीएम के आगे लगी लंबी-लंबी लाइनों के बीच गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को अपना प्रचार करने में भी आसानी हो रही है। नाराजगी के माहौल में जीजीपी कार्यकर्ता लोगों के बीच जनता को हो रही परेशानियों का जिक्र करते हैं, और भाजपा-कांग्रेस की बुराई करके जनता के गुस्से को और हवा दे रहे हैं।

इसके अलावा भाजपा में स्थानीय नेताओं में भी नाराजगी है। पूर्व विधायक सुदामा सिंह टिकट न मिलने से काफी नाराज हैं। इनके अलावा, विधायक रामलाल रोतेल मंत्री न बनाए जाने का बदला ले रहे हैं, और पार्टी को सहयोग नहीं कर रहे हैं।  मीना सिंह और नरेंद्र मरावी भी पूरी रुचि के साथ मोर्चा नहीं संभाल रहे हैं। अब कांग्रेस प्रत्याशी हिमाद्री सिंह की भतीजी जागृति सिंह को भाजपा में शामिल कराके शिवराज ने भरपाई करने की कोशिश की है।

समस्या कांग्रेस की भी है क्योंकि पूर्व सांसद राजेश नंदिनी सिंह की बेटी होेने के अलावा हिमाद्री सिंह का कोई राजनीतिक योगदान इलाके में नहीं रहा है। उन्हें बाहरी प्रत्याशी भी माना जा रहा है क्योंकि वो अधिकतर दिल्ली में ही रहती हैं।

कांग्रेस की प्रत्याशी को पार्टी के अन्य नेताओं का समर्थन जुटाने में भी दिक्कत हो रही है। टिकट न मिलने से नाराज पूर्व विधायक बिसाहूलाल सिंह एक दुर्घटना का भी शिकार हो गए हैं, और इस बहाने उन्हें प्रचार न करने का बहाना मिल गया है। इलाके के एक और प्रभावशाली नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह अपने बेटे की शादी की तैयारियों में व्यस्त हैं । मैहर उपचुनाव में कांग्रेस की हार के बाद उन्हें वैसे भी दायित्व से मुक्त रखा जा रहा है। इसी तरह से ब्राह्मणों में असर रखने वाले कांग्रेस नेता सुंदरलाल तिवारी को भी प्रचार से दूर रखा जा रहा है।

कांग्रेस और भाजपा दोनों के प्रत्याशियों को नोटबंदी से भी परेशानी हो रही है, जबकि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के उम्मीदवार और कार्यकर्ता इससे बेअसर हैं। जीजीपी वैसे भी संसाधनविहीन पार्टी मानी जाती है, और उसके कार्यकर्ता ही अपने स्तर पर घर-घर जाकर अपने समुदायों के बीच वोट माँगते हैं, और इसमें उनका कोई खर्चा नहीं होता।

केंद्र की उलझन में फंसे भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं का भी ध्यान अब शहडोल लोकसभा सीट के उपचुनाव की ओर नहीं है क्योंकि सीट पर भाजपा की हार या जीत से केंद्र में कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। खतरा यह भी है कि जो भी राष्ट्रीय नेता शहडोल में ज्यादा सक्रियता दिखाएगा, हार की जिम्मेदारी भी उसी पर थोप दी जाएगी। ऐसे में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और भाजपा प्रत्याशी ज्ञान सिंह शहडोल में एकदम अकेले पड़ते जा रहे हैं।

शिवराज सिंह ने गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह को शहडोल सीट जीतने की जिम्मेदारी दी है, लेकिन चुनाव-प्रबंधन के लिए वो कोई बहुत अच्छे नेता नहीं माने जाते। खुद भूपेंद्र सिंह शहडोल में भाजपा की टक्कर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से मानते हैं।

कुल मिलाकर जो परिस्थितियाँ बन रही हैं, उनमें भाजपा और कांग्रेस दोनों ही मुश्किलों से जूझ रही हैं, और फायदे में दिख रही है तो गोडवाना गणतंत्र पार्टी जिसके पास फिलहाल खोने को कुछ नहीं है।

गोंडवाना गणतंत्र पार्टी एक समय राज्य में तेजी से उभरी थी और साधनहीन होने के बावजूद उसके तीन विधायक जीत गए थे। हालाँकि, उसके बाद कांग्रेस ने पार्टी में फूट डलवाकर उसे कमजोर कर दिया था। बाद में, पार्टी के नेताओं को समझ में आया और वो फिर से एकजुट हुए। इसी एकजुटता की ताकत को बनाए रखने के लिए पार्टी ने अपने सबसे बड़े नेता हीरासिंह मरकाम को मैदान में उतारा है, जो कि आदिवासियों के बीच जाना-पहचाना नाम है।  ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि शहडोल सीट का चुनाव परिणाम एक नया संदेश देगा।

Comments 0

Comment Now


Videos Gallery

Poll of the day

शिवराज सरकार किसानों को बर्बाद क्यों कर रही है?

29 %
10 %
60 %
Total Hits : 75815