Thursday, 21st September 2017

एनकाउंटर के बहाने शिवराज ने बचा ली अपनी गद्दी

Tue, Nov 1, 2016 10:26 AM

- महेंद्र नारायण सिंह याद

भोपाल जेल ब्रेक और फिर अंडर ट्रायल सिमी कार्यकर्ताओं के एनकाउंटर की घटना में मौजूद अनेक पेंचों के बीच कुछ राजनीतिक दाँव--पेंच भी शामिल दिखते हैं। एक तरह से भाजपा ने इस कांड से कई निशाने साधने की कोशिश की है। सरकार को ये तो पता ही था कि फर्जी एनकाउंटर का आरोप लगना ही है, लेकिन उसे भरोसा था कि जिस तरह से गुजरात सरकार फर्जी एनकाउंटरों के आरोपों के बावजूद, टिकी रही, और ज्यादा मजबूत हुई, उसी तरह से मध्य प्रदेश सरकार को भी फर्जी एनकाउंटर से कोई असर नहीं पड़ेगा।

इस एक आरोप की आड़ में, एक मकसद तो यह साबित होता है कि मारे गए सिमी कार्यकर्ता सबूतों के अभाव में जल्द ही अदालत से छूटने वाले थे। अगर ये विचाराधीन कैदी अदालत से छूट जाते, तो उन्हें फंसाने वाले अधिकारियों पर मुसीबत आ जाती। सरकार पर भी आरोप लगता और यह कहा जाता कि मालेगांव विस्फोटों की तरह इसमें भी निर्दोष मुसलमानों को फंसाया गया और उन्हें जबरन आतंकवादी बताया गया। अब फर्जी एनकाउंटर का आरोप तो सरकार झेल लेगी, लेकिन इन आरोपियों के रिहा होने पर होने वाली छीछालेदर से तो सरकार बच गई।

एक और मकसद उत्तर प्रदेश के चुनावों से संंबंधित रहा है। मारा गया हेड गार्ड रमाशंकर उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर का है और जाति से यादव है। एनकाउंटर के मूल कारण के रूप मेंं रमाशंकर की हत्या और उस दौरान केवल एक अन्य गार्ड का मौजूद होना, और सीसीटीवी कैमरे बंद रहना एक बड़ी साजिश है। रमाशंकर यादव की हत्या से यादवों को मुस्लिमों के खिलाफ भड़काने की कोशिश की जा सकती है। 

तीसरा  मकसद शिवराज सिंह चौहान ने अपने हित में साधा है। भाजपा और संघ के हलकों में लंबे समय से चर्चा है कि कम से कम एक भाजपाशासित राज्य में दलित मुख्यमंत्री होना उसकी रणनीति के हिसाब से दुरुस्त रहेगा। अब दलित मुख्यमंत्री बनाना है तो किसी मौजूदा मुख्यमंत्री को हटाना भी तो होगा।

सुनने में आ रहा था कि व्यापम घोटाले में घिरे, अपराध रोकने में बुरी तरह से नाकाम और एक समय प्रधानमंत्री पद के दावेदारी करने वाले शिवराज ही मोदी-अमित के निशाने पर थे। व्यापम घोटाले की सीबीआई जाँच शुरू हो जाने के बाद शिवराज को ही हटाना सबसे आसान भी होता और कैलाश विजयवर्गीय जैसे उनके विरोधी भी अमित शाह के कान भरने में लगे थे।

वैसे तो विजयवर्गीय खुद ही मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन ऐसा न हो पाए, तो कम से कम 12 साल से डटे शिवराज ही हट जाएं, और कोई कमजोर मुख्यमंत्री आ जाए तो परोक्ष रूप से सत्ता विजयवर्गीय के हाथों में होगी और ये स्थिति भी उनके लिए बुरी नहीं होती।

8 सिमी कार्यकर्ताओं को एक साथ एनकाउंटर में मार गिराने के बाद अब स्थिति पूरी तरह से शिवराज के पक्ष में हो गई है। अब जो 'राष्ट्रवादी' माहौल तैयार हुआ है और हो रहा है, उसमें भाजपा फिलहाल काफी समय तक शिवराज को हटाने के बारे में सोच भी नहीं सकती।

आरएसएस के राष्ट्रवाद के नए नायक के रूप में शिवराज उभरकर आ चुके हैं, और अब उन्हें हटाना तो दूर,उल्टे यूपी चुनावों में स्टार प्रचारक तक के रूप में लगाना भाजपा की रणनीति में शामिल किया जाएगा।

उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में अगर भाजपा का प्रदर्शन अच्छा न रहा तो सबसे ज्यादा असर मोदी और अमित शाह के रुतबे पर पड़ेगा और वो खुद भी शिवराज को अपदस्थ करने की स्थिति में न रहेंगे। इस तरह से शिवराज को यह फायदा हो जाएगा। फिर मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव निकट आ जाएँगे, और ऐन चुनावों के मौके पर तो भाजपा नया मुख्यमंत्री  लाने का जोखिम लेगी नहीं। इस तरह से शिवराज सिंह चौहान ने अपनी गद्दी लंबे समय तक के लिए सुरक्षित कर ली है।

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