Friday, 24th November 2017

अब मोदी उतरे अखिलेश और मायावती को देने टक्कर

Tue, Oct 4, 2016 9:23 PM

- महेंद्र नारायण सिंह यादव

उत्तर प्रदेश विधानसभा के आने वाले चुनावों को देखते हुए मुश्किल में फँसी भाजपा की स्थिति संभालने के लिए अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद ही मैदान में उतरने जा रहे हैं। भाजपा के रणनीतिकारों ने ये मान लिया है कि उनके अन्य नेताओं में न तो मायावती की बड़ी रैलियों का जवाब देने की क्षमता है, और न ही अखिलेश यादव की विकासपरक छवि के खिलाफ वो ज्यादा कुछ बोल पा रहे हैं। यहाँ तक कि मृतप्राय कांग्रेस तक को राहुल यूपी में चर्चा में ले आए हैं, लेकिन भाजपा के पैर किसी भी तरह से जमते नहीं दिख रहे हैं।

प्रधानमंत्री अपने उत्तर प्रदेश अभियान की शुरुआत लखनऊ में दशहरा समारोह में शामिल होकर करने वाले हैं। इस बार श्री मोदी दिल्ली के बजाय, लखनऊ में ऐशबाग की रामलीला में मौजूद रहेंगे और भाजपा की स्थिति संभालने की कोशिश करेंगे। इसके पहले वे दिल्ली के सुभाष मैदान में ही दशहरा मनाते रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विवशताएँ अब उन्हें लखनऊ ले जा रही हैं। 

भाजपा को लगता है कि घरेलू और सुरक्षा मोर्चों पर तमाम नाकामी के बावजूद श्री मोदी का क्रेज जनता के बीच अब भी इतना बना हुआ है कि वे उत्तर प्रदेश में पार्टी की नैया पार लगा सकते हैं। एक बार श्री मोदी मैदान में उतर आएँगे तो चुनावी परिदृश्य में भाजपा की अनदेखी करना मुश्किल हो जाएगा। फिलहाल तो हालत ये हो गई है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, दोनों ही भाजपा सरकार के बारे में कोई खास चर्चा करना न पसंद करती हैं, और न ही ज़रूरी समझती हैं।

भाजपा की स्थानीय इकाई भी मज़बूत प्रदेश नेतृत्व के अभाव में भ्रमित दिख रही है। केशव प्रसाद मौर्य और स्वामी प्रसाद मौर्य की पहुँच बहुत ही सीमित दिख रही है और अखिलेश यादव तथा मायावती के सामने वे किसी भी तरह से टिकते नहीं दिख रहे हैं।

भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती समाजवादी पार्टी की आक्रामक चुनावी रणनीति से मिल रही है। समाजवादी पार्टी ने मीडिया के तमाम विरोधी रुख के बावजूद यह छवि तो बना ली है कि अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में विकास की नई धारा बहा दी है। पार्टी के अंदरूनी झगड़े से उसकी स्थिति कुछ कमजोर लगती प्रतीत होती है, लेकिन इसकी आड़ में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को मिल रही सहानुभूति अंतत: समाजवादी पार्टी को ही वोट दिलाएगी और यही भाजपा के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात है।

भाजपा की रणनीति अब केवल अखिलेश यादव को घेरने की है। सूत्र बताते हैं कि बहुत चालाकी से भाजपा ने अपने समर्थक पत्रकारों को किसी न किसी बहाने से अखिलेश यादव से निकटता बनाने के लिए लगा दिया था, उसके परिणाम सामने आने लगे हैं। कई भाजपाई मानसिकता वाले पत्रकारों ने अखिलेश से मित्रता बनाकर, उनको चुनाव प्रचार में मदद करने का आश्वासन दे दिया है। इस बहाने कई पत्रकारों ने अच्छी-खासी कमाई भी शुरू कर दी है। भाजपा की रणनीति यही है कि कुछ हल्की-फुल्की कवरेज करके ये पत्रकार समाजवादी पार्टी को खुश कर दें, लेकिन ऐन चुनाव के मौके पर वे एकदम से उसका साथ छोड़ दें।

संघी पत्रकारों की मुख्यमंत्री तक पहुंच बनने से भाजपा को एक फायदा ये भी होता दिख रहा है कि सामाजिक न्याय के मुद्दे को महत्व देने वाले पत्रकार अखिलेश यादव से दूर जाते दिख रहे हैं। कुछ बड़े ब्रांडों के अपने इर्द-गिर्द रहने पर अखिलेश को इन पत्रकारों की कमी महसूस भी नहीं हो रही है।

भाजपाई पत्रकार भी इसी रणनीति पर काम कर रहे हैं। चुनाव कुछ अधिक निकट आते ही वे बदायूँ कांड जैसे कुछेक मामलों को इतना ज्यादा तूल दे सकते हैं कि उसका डैमेज कंट्रोल करना सपा के लिए मुश्किल हो जाएगा।

ऐसी परिस्थिति में मीडिया एक बार फिर से नरेंद्र मोदी का गुणगान शुरू कर देगा और जनता को समझाने की कोशिश करेगा कि श्री मोदी ही एकमात्र विकल्प हैं। अब ये एकदम से नहीं हो सकेगा इसलिए भाजपा ने प्रधानमंत्री मोदी की सक्रियता धीरे-धीरे प्रदेश में बढ़ाने की योजना आगे बढ़ाई है।

श्री मोदी को अखिलेश यादव और मायावती के सामने सीधे टक्कर में उतारने के अपने खतरे भी हैं क्योंकि अगर भाजपा को अपेक्षित परिणाम न मिले तो भाजपा होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएगी। इसका नुकसान उसे अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 2019 के लोकसभा चुनावों में भी उठाना पड़ सकता है। हालाँकि, अमित शाह के बेअसर हो जाने के बाद, अब भाजपा के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है, इसलिए फिलहाल उसने ये खतरा उठाने का फैसला कर लिया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टीकाकार हैं)

Comments 0

Comment Now


Videos Gallery

Poll of the day

शिवराज सरकार किसानों को बर्बाद क्यों कर रही है?

34 %
10 %
56 %
Total Hits : 77699