Friday, 24th November 2017

म.प्र. के बुंदेलखंड के सांसदों का परफॉर्मेंस : कुछ रहे सक्रिय कुछ रहे सुस्त

Sat, Aug 13, 2016 1:31 AM

नई दिल्ली, 13 अगस्त, 2016:  लोकसभा के 12 अगस्त को समाप्त हुए मॉनसून सत्र में म.प्र. के बुंदेलखंड के सांसदों का परफॉर्मेंस मिला-जुला रहा। पाँच सांसदों में सागर के सांसद लक्ष्मी नारायण यादव ने सबसे ज्यादा प्रश्न उठाए।

संसद की कार्यवाही और लोकतांत्रिक घटनाओं पर नजर रखने वाली संस्था स्टडी डेमोक्रेसी के अनुसार  इसके पहले के सत्रों में टीकमगढ़ सांसद डॉ वीरेंद्र कुमार और दमोह के सांसद प्रह्लाद पटेल सबसे ज्यादा सक्रिय दिखते थे और सबसे ज्यादा सवाल उठाते थे, लेकिन इस सत्र में सागर के सांसद लक्ष्मीनारायण यादव ज्यादा सक्रिय दिखे।

स्टडी डेमोक्रेसी के उपनिदेशक ऋतुराज सिंह के अनुसार, सबसे खराब परफॉर्मेंस हमेशा की तरह खजुराहो के सांसद नागेंद्र सिंह का रहा।  उन्होंने इस सत्र में एक भी प्रश्न नहीं उठाया। इसके पहले भी किसी भी सत्र में उन्होंने कोई प्रश्न नहीं किया।

सागर के सांसद लक्ष्मीनारायण यादव की उपस्थिति मॉनसून सत्र में 94 प्रतिशत रही और इस दौरान उन्होंने 27 महत्वपूर्ण प्रश्न सरकार से पूछे। कुल 7 बहसों में उन्होंने हिस्सा भी लिया।

 

दमोह के सांसद प्रह्लाद पटेल की उपस्थिति इस सत्र में 100 प्रतिशत रही और इस दौरान उन्होंने भी 25 प्रश्न सरकार से किए। इसके अतिरिक्त उन्हें 12 बहसों में भी बोलने का मौका मिला।

 

टीकमगढ़ के सांसद डॉ वीरेंद्र कुमार भी बुंदेलखंड के सक्रिय सांसदों में शामिल हैं। इस सत्र में उनकी उपस्थिति भी 100 प्रतिशत रही। सत्र में उन्होंने 22 प्रश्न किए और 13 बहसों में वे बोले भी।

 

खजुराहो के सांसद नागेंद्र सिंह बुंदेलखंड के सबसे सुस्त सांसदों में हैं। इस सत्र में उनकी मौजूदगी 94 प्रतिशत रही। प्रश्न इन्होंने एक भी नहीं किया, और कुल 3 बहसों में वे बोले।

 

दतिया-भिंड के सांसद भागीरथ प्रसाद की भी गिनती सुस्त सांसदों में होती है। इस सत्र में उनकी भी मौजूदगी तो 94 प्रतिशत रही लेकिन एक तरह से वे केवल चुपचाप बैठे रहे।  पूरे सत्र में उन्होंने केवल 1 प्रश्न लगाया और कुल दो बहसों में वे बोले।

स्टडी डेमोक्रेसी के अनुसार, संसद की कार्यवाही का स्वरूप कुछ ऐसा है कि कई बार सभी सांसद चाहकर भी बोलने का मौका नहीं पा पाते हैं और अक्सर सदन में कुछ बड़े नेता ही बोलते हैं। 

सांसदों के बोलने का समय सांसदों के अनुसार नहीं, बल्कि पार्टी के अनुसार आवंटित होता है, जिसके कारण बड़ी पार्टियों के कई सांसदों को बोलने का  मौका नहीं मिल पाता और उनके बड़े नेता ही बोलते रहते हैं। दूसरी तरफ दो-चार या एक-दो सांसद वाली पार्टियों के सांसदों की स्थिति बेहतर रहती है क्योंकि उन्हें कम ही सही लेकिन तकरीबन हर रोज बोलने का मौका मिल जाता है।

भाजपा इस समय लोकसभा में भारी बहुमत से सदन में है, इसलिए इसके कई सांसदों को बोलने का मौका नहीं मिल पाता। ऐसे में सक्रिय सांसद प्रश्नकाल में लिखित या मौखिक प्रश्न लगाकर ही अपने क्षेत्र की समस्याओं को उठा पाते हैं।

 

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