Friday, 24th November 2017

स्वामी प्रसाद मौर्य के भाजपा में आने से केशव मौर्य को खतरा

Mon, Aug 8, 2016 4:19 PM

बहुजन समाज पार्टी छोड़कर निकले स्वामी प्रसाद मौर्य के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने से उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को किनारे होने का खतरा बढ़ गया है। केशव प्रसाद मौर्य बहुत कोशिश में लगे थे कि पार्टी उन्हें राज्य में मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दे, लेकिन योगी आदित्यनाथ, स्मृति ईरानी, और कई नेताओं के भी ऐसे ही दावे होने के कारण उनकी दाल नहीं गल पा रही थी। बाबूसिंह कुशवाहा के जनाधिकार मंच की सक्रियता के कारण उनकी कुशवाहा-मौर्य वोट खींच पाने की क्षमता पर भी पार्टी को संदेह था। यही कारण है कि भाजपा के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को पार्टी में लाने में लगे थे।

स्वामी को पार्टी में लाने में सफलता तो मिल गई, लेकिन स्वामी भी खूब ठोंक-बजाकर सौदेबाजी करके ही माने हैं। खबर है कि वे मुख्यमंत्री नहीं तो उपमुख्यमंत्री पद के आश्वासन पर ही भाजपा में आए हैं। अब भाजपा में पिछड़ों और उसमें भी मौर्य समाज को लेकर इतनी उदारता तो नहीं आई है कि प्रदेशाध्यक्ष, मुख्यमंत्री पद का दावेदार और उपमुख्यमंत्री पद का दावेदार, तीनों एक ही जाति से बना दें। एक म्यान में दो तलवारें जिस प्रकार से नहीं आ सकतीं, उसी तरह से भाजपा में दो-दो मौर्य नेताओं को लीडर पेश नहीं किया जा सकता। अगर बीजेपी ऐसा करती है तो बाकी पिछड़ों और अनुसूचित जाति के नेताओं के लिए जगह नहीं बचेगी, जो कि पहले से ही पार्टी में हाशिए पर हैं। 

स्वाभाविक है कि अब मौर्य नेताओं में से किसी एक को ही तरजीह मिलेगी। या तो स्वामी प्रसाद मौर्य का जलवा रहेगा या केशव प्रसाद मौर्य का। मात केशव के खाने के ही आसार ज्यादा हैं क्योंकि स्वामी प्रसाद को पर्याप्त तवज्जो न मिली तो वे पार्टी से निकलकर किसी और दल में भी जाने में देर न लगाएँगे। अगर भाजपा किसी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं करेगी तो उसके भी नुकसान हैं। स्वामी को प्रोजेक्ट करेगी तो पुराने पार्टीजनों में असंतोष हो सकता है। ब्राह्मण, ठाकुर और बनिया वर्ग में नाराजगी होगी ही।

ऐसे में माना जा रहा है कि केशव प्रसाद मौर्य को जल्द ही हाशिए पर किया जा सकता है, और कुशवाहा-मौर्य समाज के नेता के तौर पर स्वामी प्रसाद मौर्य को ही तरजीह मिलेगी। स्वामी प्रसाद मौर्य के भाजपा में शामिल होने के मौके पर केशव प्रसाद भले ही खुश दिखने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनके अंदर की पीड़ा उनसे छिप नहीं पा रही थी।

उधर स्वामी प्रसाद मौर्य का दावा है कि बसपा छोड़ते ही उत्तर प्रदेश में वह तीसरे नंबर पर पहुँच गई थी और अब भाजपा में शामिल हुए हैं तो बसपा पूरी तरह से खत्म हो गई है। केशव प्रसाद ने भी स्वामी प्रसाद का भाजपा में स्वागत करते हुए कहा कि स्वामी अब तक गलत पार्टी में थे लेकिन अब वो सही जगह आ गए हैं। पहले भाजपा 265 सीटें पाने की बात करती थी, लेकिन अब वह 300 से ज्यादा सीटें लाएगी।

ये समझना मुश्किल नहीं है कि दोनों मौर्यों के दावे अतिश्योक्तिपूर्ण हैं और केवल अपने समर्थकों का उत्साह बढ़ाने के लिए ही बोले गए हैं। भाजपा में मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट होने लायक कोई ढंग का नेता तक नहीं है, जबकि मुख्यमंत्री बनने के इच्छुक नेताओं की लंबी कतार है।

स्वामी प्रसाद मौर्य को महत्व न देने की माँग के पीछे केशव प्रसाद मौर्य के समर्थकों के निम्न तर्क हैं :

1. स्वामी नए नए पार्टी में आए हैं और पार्टी की नीतियों-विचारों के प्रति उनकी निष्ठा अभी प्रमाणित होनी है।

2. स्वामी राम मंदिर समर्थकों को देशी आतंकवादी बोलते रहे हैं।

3. बहुजन समाज पार्टी में रहते उन्होंने सवर्णों का बहुत विरोध किया था, और बसपा की सर्वजन समाज की नीति का कड़ा विरोध किया था।

4. केशव प्रसाद मौर्य प्रदेश में संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं, और पार्टी ने बड़े-बड़े पोस्टरों के जरिए एक तरह से संकेत दे ही दिया था कि वो ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे। अब उन्हें किनारे करके स्वामी प्रसाद को फ्रंट में लाने से केशव समर्थकों का मनोबल गिरेगा और जनता में भी खराब संदेश जाएगा।

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Puru

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