Sunday, 19th November 2017

मुट्ठी भर एमबीए ग्रेजुएट छात्रों को मिलती है नौकरी

Wed, Apr 27, 2016 7:24 PM


लखनऊ: मोटी रकम लेकर एमबीए ग्रेजुएट तैयार कर रहे ज्यादातर बिजनेस स्कूलों से बेरोजगारों और अर्धबेरोजगार 'पेशेवरों' की खेप दर खेप निकल रही हैं। उद्योग मंडल 'एसोचैम' के एक ताजा अध्ययन में किए गए महत्वपूर्ण सर्वेक्षण में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है।
एसोचैम की एजुकेशन कमेटी द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक देश में चल रहे 5500 बिजनेस स्कूलों में से सरकार द्वारा संचालित भारतीय प्रबंध संस्थानों तथा कुछ मुट्ठी भर संस्थाओं को छोड़कर बाकी सभी इदारों से डिग्री लेकर निकलने वाले ज्यादातर छात्र-छात्राएं कहीं भी रोजगार पाने के लायक नहीं हैं। आलम यह है कि एमबीए की डिग्री रखने वाले बड़ी संख्या में लोग 10 हजार रुपये से कम की पगार पर नौकरी कर रहे हैं, जो अर्धबेरोजगारी की निशानी है।
एसोचैम के राष्ट्रीय महासचिव डीएस रावत के अनुसार, सर्वे में इन बिजनेस स्कूलों के स्तर में गिरावट पर चिंता जाहिर करते हुए बताया गया है कि उनमें से अनेक संस्थानों का समुचित नियमन भी नहीं हो रहा है और आईआईएम संस्थानों से निकलने वाले छात्र-छात्राओं को छोड़ दें तो बाकी स्कूलों और संस्थानों से पढ़कर निकलने वाले पेशेवरों में से केवल सात प्रतिशत छात्र-छात्राएं ही रोजगार देने योग्य बन पाते हैं।
सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले दो वर्षों के दौरान दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, मुंबई, कोलकाता, बेंगलूर, अहमदाबाद, लखनऊ, हैदराबाद, देहरादून इत्यादि शहरों में करीब 220 बिजनेस स्कूल बंद हो चुके हैं। इसके अलावा कम से कम 120 ऐसे संस्थान इस साल बंद होने की कगार पर हैं। शिक्षा की निम्न गुणवत्ता और आर्थिक मंदी की वजह से वर्ष 2014 से 2016 के बीच कैम्पस रिक्रूटमेंट में भी 45 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आई है।
रावत ने कहा कि पिछले पांच साल के दौरान देश में बिजनेस स्कूलों की संख्या तीन गुना बढ़ गई है। वर्ष 2015-16 में इन स्कूलों में एमबीए पाठ्यक्रम के लिए कुल पांच लाख 20 हजार सीटें उपलब्ध थीं। वर्ष 2011-12 में यह संख्या तीन लाख 60 हजार थी। उन्होंने कहा कि गुणवत्ता नियंत्रण तथा मूलभूत ढांचे की कमी, कैम्पस प्लेसमेंट के जरिये कम वेतन वाली नौकरियां मिलना और योग्य शिक्षकों की कमी की वजह से भारत में बिजनेस स्कूलों की दुर्दशा है। ज्यादातर बिजनेस स्कूलों में शिक्षा के स्तर को उन्नत करने तथा मौजूदा वैश्विक परिदृश्य के अनुसार शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की जरूरत नहीं महसूस की जाती है। इसकी वजह से उनमें पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम व्यर्थ साबित होते हैं।
सर्वेक्षण के मुताबिक, एमबीए के दो साल के पाठ्यक्रम के लिए हर छात्र आमतौर पर तीन से पांच लाख रुपये खर्च करता है, लेकिन शीर्ष 20 बिजनेस स्कूलों और संस्थानों को छोड़कर बाकी इदारों से पढ़कर निकलने वाले ज्यादातर पेशेवरों को मात्र आठ से 10 हजार रुपये प्रतिमाह के वेतन पर काम करना पड़ रहा है। रावत ने कहा कि भारत में बिजनेस क्षेत्र की उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बेहद खराब है और वह कॉरपोरेट जगत की जरूरतों को सामान्यत: पूरा नहीं कर पाती है। उन्होंने कहा कि देश में हर साल 15 लाख इंजीनियरिंग ग्रेजुएट पढ़कर निकलते हैं और उनमें से 20 से 30 प्रतिशत को रोजगार नहीं मिलता। इसके अलावा बड़ी संख्या में इंजीनियर्स को उनकी अर्जित योग्यता के अनुरूप नौकरी नहीं मिल पाती।

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