Sunday, 19th November 2017

बागी विधायकों की सदस्‍यता पर अब 28 को होगी सुनवाई

Tue, Apr 26, 2016 6:22 PM

नैनीताल। उत्तराखंड में कांग्रेस के नौ बागी विधायकों को विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित करने संबंधी स्पीकर के आदेश को चुनौती देती याचिका पर अब 28 अप्रैल को सुनवाई होगी। उधर, मुख्य न्यायाधीश केएम जोजफ की अध्यक्षता वाली खंडपीठ में लेखानुदान अध्यादेश को चुनौती देती निवर्तमान सीएम की याचिका पर सुनवाई स्‍थगित हो गई है। कपिल सिब्बल ने कहा की 356 मामला सुप्रीम कोर्ट में है इसलिए इस मामले को बाद में सुना जाए। इस आधार पर सुनवाई स्थगित कर दी गई है।
स्‍पीकर की ओर से अधिवक्‍ता अमित सिब्‍बल ने दलील देते हुए कहा कि सत्ताधारी दल के साथ ही बाहर से समर्थन देने वाले भी मनी बिल का विरोध नहीं करते। स्पीकर ने लोकतंत्र की मजबूती के लिए सही कार्रवाई की। बागियों ने राज्यपाल से मिलकर सत्ताधारी दल का होने के बावजूद कहा कि सरकार गिर चुकी है।
अमित सिब्बल ने कोर्ट के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि सदन में मनी बिल ध्वनि मत से पारित हुआ। स्पीकर के फैसले पर बाहरी रिव्यू प्रतिबंधित। संविधान के अनुच्छेद 212 में स्पीकर को विशेषाधिकार हासिल। 
सिब्‍बल ने कहा कि बागी विधायकों ने भाजपा के साथ मिलकर नई सरकार बनाने का बयान दिया। साथ ही मुखयमंत्री की सार्वजानिक आलोचना की। दलील दी कि भाजपा के 26 विधायकों के साथ कांग्रेस के नौ बागी विधायक राजभवन गए। उन्‍होंने संयुक्त मेमोरंडम देकर दल बदल कानून को तोड़ा है। असंवैधानिक तरीके से सरकार को अल्पमत में बताया।
सरकार को 18 की सुबह ही बर्खास्त करने की मांग कर दी। गवर्नर से मिलकर क्यों की मत विभाजन की मांग। 44 हजार करोड़ के विनियोग विधेयक का विरोध किया, जिसमें सरकार की महत्वपूर्ण योननाएं शामिल थी।
अमित सिब्‍बल ने कहा कि उत्तराखंड का मामला कर्नाटक के येद्दियुरप्पा मामले से अलग है। वहां विधायकों ने सीएम को भ्रष्ट, तानाशाह होने तथा भाई भतीजावाद का आरोप लगाया और वहां विधायक सीएम के खिलाफ थे, जबकि यहां विधायक सरकार के खिलाफ हैं। बागी विधायकों ने राज्यपाल से अपनी सरकार को बर्खास्त करने की मांग की। सदन में क्या हुआ, उसका पता नहीं और उस पर बहस नहीं हो सकती।
सिब्‍बल ने दलील दी कि राज्यपाल को सौंपा ज्ञापन ऐसा दस्तावेज है, जिसके बाद बागी विधायकों पर कार्रवाई जायज थी। बागी सिर्फ अपनी सरकार गिराने का काम कर रहे थे, इसलिये मनी बिल का विरोध किया।
अमित सिब्बल ने दलील दी कि बागी विधायकों ने भाजपा विधायकों के साथ मिलकर अपनी सरकार को बर्खास्त करने की मांग की। मेमोरंडम में दस्तखत भी किये। इसका मतलब कांग्रेस की सदस्यता का स्वेच्छा से परित्याग किया, जो दसवी अनुसूची के 2(1)क के तहत दलबदल कानून की श्रेणी में आता है। सिब्‍बल ने स्पीकर के आदेश का भी हवाला दिया कि दलबदल से परिपक्व लोकतंत्र में बाधा उत्पन्न हो रही है। स्‍पीकर की ओर से कपिल सिब्‍बल ने भी कोर्ट में दलील रखी।
बीते रोज हाई कोर्ट ने स्पीकर के अधिवक्ताओं से पूछा कि विनियोग विधेयक पारित हुआ या नहीं। कोर्ट ने इस सवाल का जवाब देने को कहा है। साथ ही कोर्ट ने यह भी पूछा है कि क्या इस मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन किया गया।

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