Thursday, 21st September 2017

छत्तीसगढ़ में पत्रकारों पर लगे आरोपों की सच्चाई

Tue, Mar 29, 2016 6:29 PM

बस्तर : छत्तीसगढ़ के बस्तर में पिछले हफ्ते गिरफ्तार हुए दो पत्रकारों के परिवार परेशान हैं। पत्रिका के पत्रकार प्रभात सिंह और उनके बाद दैनन्दिनी के दीपक जायसवाल पर लगाए गए आरोपों की पड़ताल करने हम दंतेवाड़ा पहुंचे। दोनों के ऊपर लगा एक आरोप साल भर पुराना है जिसमें स्कूल के भीतर घुसकर जबरन तस्वीरें लेने और स्कूल के स्टाफ से बदसलूकी करने का आरोप है।
स्कूल में पैसे लेकर नकल की 'सुविधा'
पुलिस ने गीदम के प्राचार्य रंजीत टीकम की शिकायत पर इन दोनों के खिलाफ जो एफआईआर लिखी उसमें गीदम के हायर सेकेण्डरी स्कूल में बिना अनुमति छात्राओं की फोटो खींचने, प्रधान पाठक के साथ धक्कामुक्की और बदतमीजी करने और अवैध रूप से पैसे वसूलने के आरोप हैं। लेकिन प्रभात सिंह और दीपक जायसवाल के भाइयों ने  कहा कि दोनों को फंसाया जा रहा है। उनका कहना है कि यह मामला एक साल पुराना है। इसकी एफआईआर पिछले साल मई में दर्ज की गई और तब से लेकर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
दीपक जायसवाल के भाई का नाम अनिल का कहना है, “कुछ विद्यार्थियों ने दीपक को बताया कि स्कूल में परीक्षा के दौरान पैसे लेकर नकल कराई जाती है। उसके बाद ही दोनों पत्रकार नकल का पर्दाफाश करने के लिए स्कूल गए। स्कूल में उन्होंने जबरन तस्वीरें नहीं लीं। जब उन्होंने देखा कि नकल हो रही है तो वहां स्टाफ से बात करने की कोशिश की।”
 क्यों नहीं हुई आठ माह में कार्रवाई?
बस्तर के अखबारों में  दंतेवाड़ा के पास गीदम इलाके में हुई इस घटना की रिपोर्टिंग हुई। अखबारों में प्रमुखता से यह खबर छपी कि स्कूल में टीचर नकल करा रहे थे। प्रभात और दीपक के वकील ने यह सवाल उठाया कि आखिरकार इन दोनों के खिलाफ पिछले 8 महीने से अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई। दीपक के भाई अनिल ने यह भी कहा कि सरकार ने नकल मामले में स्कूल के कर्मचारियों पर भी कार्रवाई की थी।
दीपक जायसवाल पत्रकार ही नहीं!
लेकिन बात इतने पर ही नहीं रुकती है। पुलिस का कहना है कि शनिवार को गिरफ्तार किया गया दीपक जायसवाल पत्रकार है ही नहीं लेकिन उसके भाई ने एनडीटीवी इंडिया को बताया कि दीपक कम से कम ढाई साल से पत्रकारिता कर रहा था। एनडीटीवी इंडिया के हाथ वह चिट्ठी भी लगी जिससे पता चलता है कि दीपक पिछले साल अक्टूबर से अखबार दैनिक दैनन्दिनी के लिए काम कर रहा था।
 शब्द का पुलिसिया अर्थ अश्लील
प्रभात सिंह पर तीन और आरोप लगाए गए हैं जिनमें दो मामलों में आधार कार्ड बनाने के लिए लोगों से अवैध रूप से पैसे लेने का आरोप प्रमुख है। लेकिन जिन दो आधार सेंटरों का जिक्र पुलिस ने एफआईआर में किया है उनमें से कोई भी सेंटर प्रभात के नाम पर नहीं है। प्रभात पर सबसे चर्चित आरोप एक व्हाट्स एप मैसेज को लेकर है जिसमें बस्तर के सीनियर पुलिस अधिकारी के लिए अश्लील भाषा के इस्तेमाल की बात कही गई। लेकिन इसके वकील और भाई कह रहे हैं उस शब्द का गलत मतलब निकाला जा रहा है। वकील क्षितिज दुबे का कहना है कि आईटी एक्ट की जिन धाराओं के तहत प्रभात को गिरफ्तार किया गया है वह धाराएं उनके मामले में लागू होती ही नहीं हैं। असल में प्रभात ने अपने व्हाट्स एप मैसेज में कहा था कि 'पत्रकार सुरक्षा कानून से केवल उन्हें परहेज है जो ऑलरेडी मामा की *** में बैठे हैं।' यह मैसेज हिंदी में ही टाइप किया गया है। प्रभात के भाई और वकील कह रहे हैं कि इस शब्द का मतलब गोद है लेकिन पुलिस और शिकायतकर्ता इसे हिंदी का अश्लील शब्द बता रहे हैं।
प्रभात सिंह ने यह मैसेज भेजने के बाद व्हाट्स एप ग्रुप छोड़ दिया था। उसने पुलिस में शिकायत की थी कि उनके खिलाफ इस ग्रुप में कुछ लोग अपमानजनक मैसेज भेज रहे हैं। पुलिस ने अब तक प्रभात की शिकायत पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया है।
पुलिस ने साध ली चुप्पी
बस्तर में लंबे समय से सक्रिय पत्रकार कमल शुक्ला कहते हैं कि खुलकर भ्रष्टाचार और पुलिस ज्यादतियों पर लिख रहे पत्रकारों को पुलिस पुराने और झूठे मुकदमों में फंसा रही है। बस्तर पुलिस का पक्ष जानने के लिए एनडीटीवी इंडिया ने कई बार आईजी एसआरपी कल्लूरी और बस्तर के एसपी आरएन दास से बात करने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई। बस्तर के एडीशनल एसपी विनय पाण्डेय ने कहा कि वे इस मामले में बोलने के लिए अधिकृत नहीं हैं।
पत्रकारों में दहशत और गुस्सा
इन दो पत्रकारों के अलावा दो और पत्रकार सोमारू नाग और संतोष यादव को पुलिस ने पिछले साल जेल में डाला और उनकी अब तक रिहाई नहीं हुई है। उन पर नक्सलियों के साथ साठगांठ का आरोप है। पत्रकारों में दहशत भी है और गुस्सा भी। विपक्ष ने अब राज्य सरकार पर दबाव बनाया तो सोमवार को सरकार ने एक कोआर्डिनेशन कमेटी बना दी जो पत्रकारों की फरियाद सुनेगी। लेकिन बस्तर में यही सुना जा रहा है कि जल्द ही कई और पत्रकारों की गिरफ्तारी तय है।

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