Wednesday, 22nd November 2017

किसकी आजादी का आंदोलन था ?

Fri, Apr 28, 2017 11:16 PM

-नीतू अनोखे -

 क्या गांधीजी का आंदोलन भारत के लोगों की आज़ादी का आंदोलन था ? भारत में पाठ्य-पुस्तकों में विकृत इतिहास पढ़ाया जाता है ।ब्राह्मण इसे इस तरह से डिज़ाइन करते है जिसमें ब्राह्मणो का गुणगान हो  और  ब्राह्मणों की बदमाशी छिप जाए । भारत के लोगों की स्वतन्त्रता के पक्षधरों को खलनायक तथा विरोधी सभी ब्राह्मणों को नायक प्रस्तुत किया जाए, जिसे पढ़कर गधे तैयार होते हैं जो भ्रम के मारे ब्राह्मणों के बनावटी इतिहास को अपना इतिहास समझ बैठते हैं । इसी वजह से खलनायक को नायक बना बैठते हैं तथा स्वयं के सत्यानाश तक के लिए अपना सहयोग दे डालते हैं ।

यदि ब्राह्मण-बनिए प्रोपोगंडा न करें तथा सब की स्वतन्त्रता की बात करें तो वे एक जीवंत लोकतन्त्र में एमपी तक नहीं बन सकते हालांकि वे शासक हैं । इसी कड़ी के एक मणि हैं गांधी जी । 
गांधी जी न तो महात्मा थे न ही भारत के राष्ट्रपिता । महात्मा इसीलिए नहीं थे क्योंकि वे जाति-पांति को बनाए रखना तथा उसे पक्का करना चाहते थे जिससे भारत के 85 % लोग पीड़ित हैं और जिसके कारण उनमें हीनभावना का संचार दिन-रात होता रहता है तथा सामाजिक बेइज्जती होती ही रहती है । यदि वे 85 % लोगों के मानवीय अधिकारों को नकारते थे तो महात्मा कैसे हो सकते हैं ?

 

प्रथम गोलमेज़ सभा में गांधीजी नहीं गए । द्वितीय में गए । तृतीय में नहीं गए । द्वितीय गोलमेज़ सभा में उन्होने उदगार निकाले कि यहाँ जितने भी लोग हैं वे भारत के प्रतिनिधि नहीं है ,मैं अकेला भारत का सच्चा प्रतिनिधि हूँ । एक तरफ वे डॉ बीआर आंबेडकर को अछूतो का प्रतिनिधि मानने से इंकार कर देते हैं और स्वयं को अछूतो का प्रतिनिधि घोषित करते हैं । दूसरी तरफ वे कहते हैं कि "यदि अछूत लोग मुस्लिम बनते हैं तो मेरा कोई विरोध नहीं है । यदि वे ईसाई बनते हैं तब भी मेरा कोई विरोध नहीं है लेकिन यदि वे हिन्दू हैं तो हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार मैं उन्हें किसी भी तरह के अधिकार बहाल करने को तैयार नहीं हूँ ।"

 हालाँकि अंग्रेज़ गधे नहीं थे । उन्होने गांधी जी के ढोंग को नहीं माना । वे समान न्याय के पक्षधर थे । उन्होने सभी को न्याय दिया जो ब्राह्मण-बनिए कभी भी नहीं दे सकते । जब अंग्रेजों ने अछूतो को 17 आगस्त 1932 में अधिकार दिया तब गांधीजी आमरण अनशन में बैठ गए । उन्होंने अंग्रेजों के विरोध में भी कभी आमरण अनशन नहीं किया था लेकिन अछूतों के विरोध में किया । डॉ आंबेडकर को डराया-धमकाया गया । डॉ आंबेडकर नहीं डरे तब उन्हें कहा गया कि भारत भर में अछूतो के घरों को जला दिया जाएगा ,हत्याएँ कर दी जाएंगी ,बलात्कार किए जाएंगे । डॉ आंबेडकर मजबूर हुये और "पूना पैक्ट " हुआ । 
राष्ट्रपिता इसीलिए नहीं थे क्योंकि भारत के 664 टुकड़ों को एक शासन के अंतर्गत तथा एक आईपीसी के दायरे में लाने वाले अंग्रेज़ थे  इसीलिए वर्तमान भारत के निर्माता अंग्रेज़ थे । भारत को गांधीजी ने नहीं बनाया बल्कि यह पहले से मौजूद था लेकिन पाकिस्तान नहीं था । उन्होने अपनी उपस्थिति में जिद करके प्रस्ताव पारित कर निश्चित करवाया कि पाकिस्तान बने ताकि भारत में ब्राह्मण-बनिए निष्कंटक राज कर सकें । इसीलिए गांधीजी भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के राष्ट्रपिता हैं ।
गांधीजी मुस्लिमों को देश तो दे सकते थे लेकिन अछूतों को मानवीय अधिकार भी नहीं क्यों ?भारत में यह इतिहास नहीं पढ़ाया जाता । यह इतिहास तो लंदन के आर्काइव्स में रखा है । क्या गांधीजी का आंदोलन भारत के लोगों की आज़ादी का आंदोलन था ? यदि था तो विदेशी ब्राह्मण-बनियों का कब्जा लोकतन्त्र के सभी स्तंभों पर क्यों है, साथ ही साथ भारत के 83 करोड़ लोग एक वक्त भूखे सोने को क्यों मजबूर हैं ? 

(लेखिका के ये विचार उनकी फेसबुक वॉल से लिए गए हैं)

 

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