Sunday, 19th November 2017

खैर ख्वाब

Mon, Apr 10, 2017 6:52 PM

       

 

 

   
 

 

 

 

                                                                                                                                  आकाश  सिंह 

 

जो नहीं पूछते थे कभी वो अब खैरियत पूछते है 
लगता है कोई सुख का पैगाम आया है क्या  ? 
पर ये तो श्वेत  लिबास में हैं
लगता हैं चुनाव आ गया हैं क्या ?

कोई पूछता पेंशन  तो कोई पूछता भत्ता
सही में ये हमारे खैरख्वाह हो गए हैं क्या ?
चुगली कर कोई काटता किसी का पत्ता 
सही में राजनीति का अर्थ यही हो गया हैं क्या 

जो थे लापता पाँच सालो से अब  रेंगने लगे हैं 
इनको ज्यादा हमारी फ़िक्र हैं क्या ?
अरे न पड़ इनके जुमले में 
क्या भला आज पूछ रहे हैं कल पूछेंगे क्या ? 

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी  हैं )

 

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