Tuesday, 19th September 2017

सिर्फ एक दिन के लिए

Sat, Apr 1, 2017 5:28 PM

- आशुतोष सिंह  

 सिर्फ एक दिन !

हाँ सिर्फ एक दिन के लिए !

बस एक दिन !

निकल आइए बाज़ार में यूँ ही

बिना किसी के काम के !

बैठिये किसी भी दुकान में

बिना कुछ ख़रीदे घंटों,

झाँकिये शीशों से रेस्टोरेंट के अंदर बैठे लोगों को,

 देखिये ऊँची ऊँची बिल्डिंगों को

रंगीन गाड़ियों को,

बिताइए सारा दिन भूखे होकर,

पहने गंदे कपडे, खुजलाते हुए बालों में

दिन भर ढूंढ़िये कोई चीज़,

शायद अपना कोई नाम

टटोलते रहिये अपनी खाली ज़ेब,

दुनिया की इस भीड़ के बीच !

बस एक दिन होकर गुमनाम

चुपचाप टंग जाइए शौचालय की गंदी दीवारों पर

एक धुंधली तस्वीर में,

एक दिन जाइए वेश्यालय

कीजिये स्त्रीवाद का दर्शन !

एक दिन सो जाइए प्लेटफार्म पर

भूलकर हर ट्रेनों का पता !

एक दिन भूलकर अपना घमंड,

भूलकर अपनी पहचान,

भूलकर अपना दिखावा,

भूलकर वो हर चीज़

जो आपको स्वार्थी हो जाने देती है !

जो आपके दुःख को महान बतलाती है !

 बस एक दिन के लिए !

सिर्फ़ एक दिन के लिए ही !

 आप इसे एडवेंचर भी कहें तो क्या फ़र्क है !

कम से कम आप उसका सही अर्थ जान पाएं !

या जान जाएं हमें जो मिला है

वो सब दुनिया में कितनो को मिला है !

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