Wednesday, 22nd November 2017

नए पथ पर अज्ञात पथिक

Sat, Apr 1, 2017 5:12 PM

- आशुतोष सिंह  

चाहे कहीं भी चले जाएं आप !

एक ट्रेन सालों से आपका पीछा कर रही है !

 सुनाई पड़ती है उसकी आवाज़ आधी रात को,

 शहर की कमर को छूकर निकलती है

हर रोज़ अँधेरे में

अनजान यात्री के साथ

किसी अज्ञात सफ़र को !

मैं नहीं देख पाया आज तक उसे !

किसी रूह की तरह वो भटक रही है आज भी !

 पर मुझे विश्वास है वो खुद ही

ढूंढ़ेगी अपनी मुक्ति का मार्ग !

जैसे नदी पहाड़ों को काटकर

खुद ही बनाती है अपना रास्ता,अपना किनारा !

जैसे संगीत पा जाता है हमारे अंतर्मन का रास्ता !

 जैसे प्रेम गहरा होने के बाद

खुद ही चुन लेता है मौन !

जैसे कविता खुद ही ढूंढ़ती है

हर बार अंतहीन अर्थ !

ये जीवन भी दिशाहीन होकर

खुद ही ढूंढ़ता है अपनी एक दिशा !

हमें उसी का इंतज़ार करते रहना है !

जीवन के साथ भटकते हुए !

हर बार लौट आना है खुद के पास

 ढूँढ़ना है अपना एक एकांत,

और हर रोज़ निकल पड़ना है

एक नये पथ पर अज्ञात पथिक की तरह !

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बहुत ही सुन्दर कविता ।।

Ashish kumar

अतिउत्तम कविता

AVNEESH

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