Tuesday, 19th September 2017

राजनीति एवं संगठन

Sat, Apr 1, 2017 9:59 AM

नेहा - 

राजनीति सामाजिक विचारधारा का मंच है। जो कोई भी व्यक्ति यह कहता है कि उसे राजनीति पसन्द नहीं है, सिर्फ समाज सेवा पसन्द है, उसेध्यान रखना चाहिए कि यह अच्छी सोच हो सकती है किन्तु हम न राजनीति से बच सकते हैं और ही न बचा सकते हैं।  ऐसे में इस तरह की तटस्थता दिखाने वाले विचार प्रदर्शित करना किसी ढोंग की तरह प्रतीत होता है। 

जब किसी व्यक्ति से पूछा जाये कि आप किस राजनीतिक संगठन को पसन्द करते हैं तब अधिकतर लोगों का उत्तर यही होता है कि मेरी विचारधारा सभी के  प्रति एकसमान है।

फिर जैसे ही वह व्यक्ति सभी राजनितिक संगठनों की कमिया बताना शुरू करे और जैसे ही उस व्यक्ति के पसंदीदा संगठन पर आये, उसमें लगाव की भावना जाग्रत होकर, बचाव पक्ष प्रस्तुत करने लगती है। ऐसे में यह समान विचारधारा कैसे रह गई ??

कहीं न कहीं हम सभी राजनीति में परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से भाग लेते हैं। जैसे जब कोई वोट डालता है तो वह उसका राजनीति में परोक्ष रूप से भाग लेना कहलाता है। दूसरा वह जो वोट भी डालते हैं और उमीदवार बन चुनाव प्रचार भी करते हैं तो यह राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेना कहलाता है ।

शब्दार्थ में राजनीति को वह नीति या पद्धति कहते हैं जिससे शासन किया जाता या होता है। अतः शासन तो प्रत्येक समाजिक संस्था और संगठनों द्वारा भी किया जाता है। बिना शासन की नीति के कोई संस्था और संगठन सुचारू रूप से नहीं चल सकते हैं। इसलिए राजनीति गलत चीज नहीं. न ही उसकी अवधारणा गलत है।

 राजनीतिक विचारधारा में सहभागिता ज़रूरी है।इसके द्वारा हमें समाजिक न्याय की आवाज को बुलन्द करने और सामाजिक अधिकारों की रक्षा करने का अवसर प्राप्त होता है। इससे ही सामाजिक अधिकारों के हनन को रोकने का  बल मिलता है। अगर राजनीति में अच्छे लोग भाग नही लेंगे तो अघोरी आप पर शासन करने लगेंगे जिनके हाथों की कठपुतली बन आप भक्ति में अंधलीन हो जाएंगे ।

ऐसे में हमें पता नहीं चलता कि कब हमारे अधिकार छिन गए। अपने ऊपर होने वाले अन्याय समझ शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए राजनीतिक भागीदारी होना आवश्यक है। इसके लिए यह आवश्यक नहीं कि आप चुनाव ही लड़ें बल्कि मताधिकार भी आपकी भागीदारी सुनिश्चित करता है।

संस्था और संगठन :~ सामान्य भाषा में सामाजिक समूह की कार्यप्रणाली के स्थापित स्वरूप को हम संस्था कहते हैं। "संस्था का स्वरूप सदैव अमूर्त होता है। वह कभी मूर्त नही होता।

 संगठन सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सैनिक, व्यावसायिक, वैज्ञानिक आदि विशेष तरह के हो सकते हैं। समाज में अपने अधिकारों की आवाज उठाने और अधिकारों की सुरक्षा के लिए,अन्याय और शोषण को रोकने हेतु संगठन अवाश्यक है, जिससे समाज का कल्याण और उत्थान करने हेतु संगठित रहना भी जरूरी है।

राजनीति में संगठन का महत्व है क्योंकि सशक्त संगठन ही शोषण और अन्याय के खिलाफ कुछ कर सकता है। अकेला व्यक्ति ऐसी स्थिति में असरहीन होता है। समाज में सशक्त संगठन होना अनिवार्य है एवम् वह पूर्ण रूप से समाजिक मंच निषपक्षता लड़ाई लड़ सके यह आज के समाज की लड़ाई हेतु आवशयक है।

राजनीति में दबाव समूह का प्रत्यक्ष महत्व भले ही न हो, लेकिन निर्वाचन के समय ये अहम भूमिका निभाते हैं। इसमें सांप्रदायिक,जातिगत और भाषागत समुदाय जैसे आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद,जमायत ए इस्लामी, बजरंग दल, हिन्दू युवा वाहिनी,इस्लामिक सेवा संघ्, बाबरी कार्य समिति, भारतीय किसान यूनियन आदि इसी प्रकार भाषागत संगठन उदाहरण के तौर पर देखे जा सकते हैं। 

परम्परागत ढांचे पर आधारित धार्मिंक और जातिगत संगठन चुनावी राजनीति पर खासा असर डालते हैं।वर्तमान में आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों की भूमिका हम राजनीति में देख ही रहे हैं। 80 के दशक के आखिर से लेकर 90 के दशक के आरंभ तक भारतीय किसान यूनियन ने भी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में राजनीति को काफी प्रभावित किया।

भारत में दबाव समूह की एक खतरनाक व्यवस्था यह है कि भारत में आधुनिकरण और शहरीकरण के बावजूद परम्परागत ढांचे पर आधारित दबाव समूह की संस्था लोकप्रियता में काफी वृद्धि हुई है। इसे ग्रामीण लोकनिर्माण की ओर तेजी से फैलाया जा रहा है जिससे साम्प्रदायिक ताकतों को बल मिलता है और उस संस्था या संगठन के सहयोग से राजनितिक पार्टियो को बल मिलता है और सत्ता भी हासिल हो जाती है।

सामाजिक संगठनों में राजनीतिक महत्वाकांक्षा पैदा होना ठीक नहीं है। ऐसे संगठन सामाजिक कार्यों में ही रहें तो ही बेहतर है। अक्सर राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण सामाजिक संगठन राजनीतिक दलों के लिए औजार बन जाते हैं, और धीरे-धीरे अपनी विश्ववसनीयता गंवा देते हैं।

(लेखिका इलाहाबाद विश्वविद्यालय की शोध छात्रा हैं)

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