Tuesday, 19th September 2017

निजीकरण से उपजे सवाल और तरक्की की दौड़ में पिछड़ता भारत

Wed, Feb 22, 2017 8:21 PM

- काव्याह यादव - 

LIBERALISATION, PRIVATISATION और GLOBALISATION को ख़ुशी ख़ुशी लाया जाता है। पब्लिक सेक्टर का डि-रेगुलराइजेशन आरम्भ हो जाता है। शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों को आम बजट में कोई खास जगह नहीं दी जाती है। इन दोनों का तेजी से निजीकरण शुरू हो जाता है। देश की निजी कंपनियों को अपार प्रोत्साहन दिया जाता है और उन्हें किसानों से कई गुना ज्यादा सब्सिडी दी जाती है। 
पब्लिक सेक्टर तथा सरकारी संस्थानों के निजी हाथों में चले जाने से वहां आरक्षण का कोई स्कोप ही नहीं बचता है, अतः देश की प्रतिक्रियावादी ताकतों ने अपने निजी हितों के सरंक्षण में देश की प्रगति पर कुठाराघात कर दिया।

दरअसल इन प्रतिक्रियावादी ताकतों को आरक्षण को दक्षिण अफ्रीका में लागू “AFFIRMATIVE ACTION” के रूप में देखना चाहिए। जब दक्षिण अफ्रीका में अश्वेतों ने अपने अधिकारों के लिए आंदोलन शुरू किया और राजनैतिक-आर्थिक-शैक्षिक-सांस्कृतिक यानी हर क्षेत्र में हिस्सेदारी की मांग की तो वहां के शोषक वर्ग ने स्वयं आगे बढ़कर उन्हें आर्थिक-राजनैतिक तथा शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण दे दिया।

दक्षिण अफ्रीका में अश्वेत बहुसंख्यक है अतः उनके हक़-हकूक को किनारे करना देश को पतन के रास्ते पर ले जाना है। देश की प्रगति के लिए सभी देशवासियों की प्रगति आवश्यक है। आज वहां श्वेत तथा अश्वेत दोनों मिलकर देश की उन्नति में लगे हुए हैं। दक्षिण अफ्रीका को 1992 में आजादी मिली और आज वो अफ्रीका महादेश के एक विकसित देश के रूप में उभर रहा है, लेकिन भारत ने वो मौका खो दिया।

यहाँ का अल्पसंख्यक-शोषक वर्ग अपने टूटते वर्चस्व को बचाने के लिए अपना अंतिम प्रयास कर रहा है और देश को पूंजीवादी कार्टेल के हाथों में बेचने के लिए तैयार बैठा है।

और अब तो शतप्रतिशत विदेशी निवेश को राष्ट्रवाद भी घोषित किया जा रहा है। अगर एफडीआई राष्ट्रवाद है तब ईस्ट इंडिया कंपनी को भगाया ही क्यों था ?

 

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