Sunday, 19th November 2017

उस सूखे हुए गुलाब के बहाने......

Thu, Feb 9, 2017 11:56 PM

- शालू यादव 

ये भेलेंटाइन वेलेंटाइन,पिरेम दिवस की नौटंकी हमको कब्बो समझ नही आई। जबसे होश संभाला तबसे फर्जीवाड़ा ही लगता रहा ये सब। गुलाब में तो कुछ खास याद नही कि कब मिले ,कैसे मिले, लेकिन एक गुलाब जो पता नही कबसे 'राही मासूम रजा' की किताब 'नीम का पेड़' में पड़े पड़े सूख गया है। वो बार बार दिमाग पर जोर डालने को मजबूर कर देता है कि, 'किसने दिया! कब दिया!',कहीं मैंने ही तो नहीं रखा!.... बहरहाल इतनी कोशिशों के बाद इतना समझ गई कि ,ये तो याद आने से रहा कि कैसे ये मेरी किताब में पहुँचा। 
हाँ! इसी के बहाने एक घटना याद आ गई। एक अफगानी, ईरानी या इराकी लड़का जो भी रहा हो, क्योंकि उस उम्र में मुझे सब एक ही जैसे लगते थे,उसने गुलाब की पेशकश की थी। उसका नाम बड़ा लंबा-सा था। याद नहीं! उसके इंडियन दोस्त उसे 'फ़िराक' बुलाते थे। खैर मेरे दिमाग में उस समय अफगान, इराक, ईरान के लड़कों को लेकर एक बंधी बंधाई इमेज थी। मसलन वो 'सेक्सिस्ट, रूढ़िवादी, औरतखोर, बेहूदा,' होते हैं। मैंने उसको झिड़क दिया। गुलाब फेंक दिया। मैं मात्र 16 की थी। आज जब ये सोच रही हूँ या जब भी सोचती हूँ तो शर्मिंदा होती हूँ।

हमारी कंडीशनिंग एक विशेष धर्म, जेंडर, मुल्क, रेस को लेकर इस तरह की जाती है कि हम मजबूर हो जाते है उन्हें कमतर आंकने को, उनसे नफरत करने को। यहीं से शुरू होता है सामाजिक गैरबराबरी का दिमाग में स्पेस कवर करना। इस वेलेंटाइन के बहाने मैं उस गलती की सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगती हूँ, उम्मीद करती हूँ कि आप, मैं, हम सब मिलकर इस कंडीशनिंग को तोड़ेंगे और आगे की पीढ़ियों को इन मानसिक जकड़न से मुक्त करने के लिए प्रयासरत होंगे।
बाकी प्रेम वरेम करते रहिये ..

खुसरो पाती प्रेम की, बिरला बांचे कोय
वेद,कुरान,पोथी पढ़ै, प्रेम बिना का होय!

( लेखिका शालू यादव, इलाहाबादी विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रसंघ उपाध्यक्ष हैं)
 

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